मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

यार ! गैस सिलेंडर यार !

यार ! गैस सिलेंडर यार !
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यार! गैस सिलेंडर यार !
काश ! तू इंसान होता
जो देता है सबक़ बेशुमार।
सबक़ पहली -
आग भी जलाते हो तुम घर - घर के चूल्हे की
तो कई पेटों की आग बुझाने के लिए
काश! लगा पाता मैं भी तुम्हारी तरह आग हर मन में
चहुँओर फैली भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए।
सबक़ दूसरी -
रंग कर रंग एक ही में सब के घर चले जाते हो तुम
कभी देखा नहीं तुम्हें कि सोची भी हो तुमने
 कभी भगवे या कभी हरे रंग में रंग जाने के लिए।
सबक़ तीसरी -
दरअसल मानता नहीं मैं तो,पर भला ये समाज ..!?
समाज हीं तय करती है कि मंदिरों के गढ़े पत्थरों में
पंडालों में , रात भर चलने वाले जागरण के ध्वनिप्रदूषणों में अपने भगवान हैं।
ये समाज यानि गोरेपन की क्रीम वाला विज्ञापन
जिसने तय कर दिया कि गोरापन हीं है सफलता की मापदंड
और काली-सांवली हैं असफल, बेकार।
मानना पड़ता है ना यार !
इसी समाज के तय किये गए तथाकथित अछूतों और स्वर्णजनों का अंतर।
पर तुम तो समाज को ठेंगा दिखाते हो
जाति, धर्म, सम्प्रदाय की खोखली दीवार ढहाते हो
सभी भेदभाव के अंतर मिटाते हो
जब एक के चौके से निकल कर दूसरे के चौके में घुस जाते हो बिंदास
बिना भेद किये जा कर घर-घर बार-बार।
यार! गैस सिलेंडर यार !
काश ! तू इंसान होता
जो देता है सबक़ बेशुमार।

साक्षात् स्रष्टा

साक्षात स्रष्टा
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एक शाम कारगिल चौक के पास
कुम्हार के आवाँ के मानिंद पेट फुलाए
संभवतः संभ्रांत गर्भवती एक औरत
साक्षात स्रष्टा , सृष्टि को सिंझाती
अपने कोख में पकाती, अंदरुनी ताप से तपाती
मानव नस्ल की कड़ी, एक रचयिता थी जाती
लगभग अपनी तीन वर्षीया बेटी की
नाजुक उँगलियों से लिपटी अपनी तर्जनी लिए हुए
इस बेटी को जनने के लिए स्वयं को दोषी मानती
इस आस में  कि शायद अबकी बार खुश कर पाएं
अपने ससुराल वालों को कोख से बेटा जन कर
बेटा यानि तथाकथित कूल-ख़ानदान का चिराग
खानदान को आगे बढ़ाने वाला - एक मोक्षदाता
फिलहाल स्वयं को दोषी मानने वाली
ससुराल वालों द्वारा दोषी ठहरायी जाने वाली
वो तो बस इतना भर जानती है कि
कोख के अंधियारे की तरह ही अँधेरी एक रात को
इस सृजन की वजह, बस इतना ही और शायद ही
उसे मालूम हो एक्स और वाई गुणसूत्रों के बारे में
काश ! ये एक्स व वाई भी ए, बी, सी, डी की तरह
जान पाती वह संभ्रांत गर्भवती औरत।

खैर ! अभी वह औरत अपने पेट के उभार को
दुपट्टे से, दाएँ से, बाएं से, सामने से, पीछे से
असफल किन्तु भरसक प्रयास करती छुपाने की
सड़क पर छितराये छिछोरों की, छोरों की और
टपोरियों की, मनचलों की, कुछ सज्जन पुरुषो की
एक्स-रे वाली बेधती नजरों से
पर कहाँ छुप पाता है भला !?
एक्स-रे तो एक्स-रे ठहरा, है ना ज़नाब !?
अन्दर की ठठरियों की तस्वीर खिंच लेता है ये
ये तो फिर भी तन का उभार है,जिसे टटोलते हैं
अक्सर टपोरी इन्हीं एक्स-रे वाली बेंधती नज़रों से
और कुछ सज्जन भी, अन्तर केवल इतना कि
टपोरी बेहया की तरह अपनी पूरी गर्दन घुमाते हैं
360 डिग्री तक आवश्यकतानुसार और ये  तथाकथित सज्जन 180 डिग्री तक हीं अपनी आँखों की पुतलियों को घुमाकर चला लेते है काम
डर जो है कि - ' लोग क्या कहेंगें '।

तभी कुछ तीन-चार ... तीन या चार ....नहीं-नहीं
चार ही थे वे -' जहाँ चार यार मिल जाएँ, वहाँ रात गुजर जाए ' गाने के तर्ज़ पर चार टपोरियों की टोली
अचानक उन छिछोरों ने की फूहड़ छींटाकसी
और बेहया-से लगाए कानों को बेंधते ठहाके
साक्षात स्रष्टा - सकपकायी-सी झेंपती औरत
असफल-सी स्वयं को स्वयं में छुपाती, समाती
ठीक आभास पाए खतरे की किसी घोंघे की तरह।
बस झकझोर-सा गया मुझे झेंपना उसका
मैं बरबस बेझिझक उनकी ओर लपका, जिनमे
था गुठखा चबाता एक सज्जन तथाकथित
जिन्हें किया संबोधित -
 ' भाई ! जब हम-आप पैदा हुए होंगे
धरती पर अवतरित हुए होंगे
उसके पहले भी, माँ हमारी-आपकी
इस हाल से, हालात से गुजरी होगी
उनके भी कोख फुले होंगे
और कोई अन्य टपोरी ठहाका लगाया होगा
कोई सज्जन पुरुष शालीनता से मुस्कुराया होगा।'
उसके सारे दोस्त  तीनों , दोस्त होने के बावजूद भी
पक्ष में मेरे बोलने लगे, वह बेशर्मी से झेंप-सा गया।

देखा अचानक उस संभ्रांत औरत की तरफ
वह साक्षात स्रष्टा झेंपती, सकपकाती, सकुचाती
अपने रास्ते कब का जा चुकी थी और ....
अब तक झेंपना उस आदमी का
ले चूका था बदला उस औरत की झेंप का
और मैं सुकून से  गाँधी-मैदान में बैठा
ये कविता लिखने लगा ... 'साक्षात स्रष्टा'।.

अनाम रिश्ते !


अनाम रिश्ते!/क्षणभंगुर
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बाद लंबी तपिश के
उपजी पहली बारिश से
मिट्टी की सोंधी खुशबू की तरह
उपजते हैं कुछ अनाम रिश्ते।

सरदी की ठिठुरती हुई
शामों से सुबहों तक
फैली ओस की बूँदों की तरह
उभरते हैं कुछ अनाम रिश्ते।

अमावस की काली रातों में
रातों के अंधियारों में
मचलते जुगनुओं की तरह
चमकते हैं कुछ अनाम रिश्ते।

क्षणभंगुर होकर भी
"सखी" न जाने क्यों?
दिल को अक्सर ही
भरमाते हैं कुछ अनाम रिश्ते।


©सुबोध सिन्हा

शनिवार, 30 मार्च 2019

मैं .. दो पंक्तियों में

तमाम उम्र मैं तो बस हैरान, परेशान, हलकान-सा तो कभी-कभी लहूलुहान बना रहा
मानो कभी मुसलमानों के हाथों की गीता तो कभी हिन्दुओं के हाथों का क़ुरआन बना रहा।

©सुबोध सिन्हा

बंजारे हैं हम

बंजारे हैं हम वीराने में बस्ती तलाश लेते हैं
नज़रों से आप दूर सही दिल के पास होते हैं  

©सुबोध सिन्हा